Friday, January 4, 2013

फेसबुक

मेरी फेसबुक की फ़्रेण्डलिस्ट में औरो के अतिरिक्त मेरी छात्राएँ भी शामिल है। यह ऑॅन लाइन कभी -कभार मुझसे मार्गदर्शन भी प्राप्त करती रहती है। अभी मैने फेसबुक ऑॅन ही की है कि दबादब अपडेट्स आने शुरू हो गए है। मेरी छात्र रिंपी ने आज फिर आपनी प्रोफाईल पिक्चर चेंज कर दी है। सौभाग्य से यह ऑॅन लाइन भी है। मैसेज आता है..... सर, नमस्कार। नमस्कार.... क्या बात आज फिर फोटो चेंज कर डाली ....किसकी है यह? मैने पूछा हैं। सर ... हीरोइन है ....कैटरीना कैफ ! जबाब पढ़ते ही सिर घूमने लग जाता है कि आजकल के बच्चों को हो क्या गया है। मैं फिर पूछता हूँ .....बेटा .... इसकी फोटो क्यों लगाई है .....। सर .... कोई हमारी फोटो का मिस यूज न कर डालें, इसीलिए लगाई है- उसने लिखा है। वह तो ठीक है बेटे ... मगर आप सिर्फ़ एकट्रेस की फोटो ही क्यों लगाते हो .... मदर टेरेसा और किरण बेदी की क्यों नही? मेरे इतना लिखते ही, रिंपी ऑॅफ लाइन हो गई। -0-

Wednesday, October 31, 2012

ਸਿਆਣਪ

“ਤੈਨੂੰ ਕਿੰਨੀ ਵਾਰ ਕਿਹਾ ਐ ਕਿ ਇਹਨੂੰ ਸਕੂਲ ਤੋਰ ਦਿਆ ਕਰ,ਜ਼ਿਆਦਾ ਦਿਨ ਘਰੇ ਰਹੀ ਤਾਂ ਇਹਦਾ ਨਾਮ ਕੱਟ ਦੇਣਗੇ... ਘਰ ਦੇ ਬਹੁਤੇ ਕੰਮਾਂ ਦਾ ਲਾਲਚ ਛੱਡ”.... ਉਸ ਨੇ ਦਿਹਾੜੀ ਤੇ ਜਾਂਦਿਆ ਆਪਣੀ ਘਰਵਾਲੀ ਨੂੰ ਕਿਹਾ। “ਤੈਨੂੰ ਤਾਂ ਉਈਂ ਬੋਲਣ ਦੀ ਆਦਤ ਐ..ਜਿਵੇਂ ਇੱਕ ਅੱਧਾ ਦਿਨ ਸਕੂਲ 'ਚ ਨਾ ਜਾਣ ਕਾਰਨ ਕੋਈ ਆਫ਼ਤ ਆਜੂ... ਜੁਆਕੜੀ ਦਾ ਜੇ ਕੁੱਝ ਦੁਖਦੈ, ਤਾਹੀਂਓ ਰੱਖੀ ਅੱਜ ਘਰੇ..ਇਹ ਤਾਂ ਸਕੂਲ ਜਾਣ ਨੂੰ ਕਹਿੰਦੀ ਸੀ..।”ਬਚਨੀ ਨੇ ਆਪਣੇ ਘਰਵਾਲੇ ਨਾਲ ਗੁੱਸੇ ਹੁੰਦੇ ਆਖਿਆ। “ ਪੁਗਾ ਲੈ ਆਪਣੀ ਮਰਜ਼ੀ.. ਜਦੋਂ ਇਹ ਬੇਗਾਨੇ ਘਰੇ ਜਾਊ,ਉਦੋਂ ਵੀ ਤਾਂ ਸਾਰੇਂਗੀ ਇਹਦੇ ਬਿਨਾਂ....”ਇਹ ਕਹਿੰਦਿਆਂ ਉਹ ਘਰੋਂ ਬਾਹਰ ਹੋ ਗਿਆ।“ਆਹ! ਬੰਦੇ ਵੀ ਜ਼ਨਾਨੀਆਂ ਨੂੰ ਪਾਗਲ ਈਂ ਸਮਝਦੇ ਨੇ..ਮੈਂ ਕਿਹਾ ਬੀ ਕੁੜੀ ਬਿਮਾਰ ਐ..ਨਪੁੱਤੇ ਦੇ ਬਥੇਰੇ ਔਹੜ ਪੌਹੜ ਕਰ ਲੇ...ਅੱਜ ਡੇਰੇ ਸਿਆਣੇ ਕੋਲ ਲੈ ਕੇ ਜਾਊ,ਚੱਲ ਨੀਂ ਮੀਤੋ ਹੋ ਜਾ ਤਿਆਰ...”ਉਸ ਨੇ ਆਪਣੀ ਕੁੜੀ ਨੂੰ ਆਵਾਜ਼ ਮਾਰਦਿਆਂ ਕਿਹਾ। 'ਨਾ ਨੀਂ ਬੇਬੇ, ਮੈਂ ਨੀਂ ਜਾਂਦੀ.. ਬਾਪੂ ਸਹੀ ਕਹਿੰਦਾ ਸੀ ਕਿ ਤੇਰਾ ਤਾਂ ਡਮਾਕ ਹੱਲ ਗਿਐ..ਕੁਛ ਨੀਂ ਹੈਗਾ ਸਿਆਣਿਆਂ ਦੇ ਪੱਲੇ..ਸਾਡੇ ਸਕੂਲ 'ਚ ਪ੍ਰਾਰਥਨਾ 'ਚ ਖ਼ਬਰਾਂ ਪੜਦੇ ਦੱਸਿਆਂ ਸੀ ਕਿ ਇੱਕ ਸਿਆਣੀ ਨੇ ਭੂਤ ਕੱਢਦੇ ਹੋਏ ਇੱਕ ਬੱਚੀ ਨੂੰ ਗਰਮ ਚਿਮਟਿਆਂ ਨਾਲ ਕੁੱਟ-ਕੁੱਟ ਕੇ ਈਂ ਮਾਰਤਾ..ਮੈਨੂੰ ਤਾਂ ਬਲਾਈਂ ਡਰ ਲੱਗਦੈ.. ਮੇਰੀ ਮੰਨੇ ਤਾਂ ਮੈਨੂੰ ਕਿਸੇ ਡਾਕਟਰ ਕੋਲ ਦਿਖਾ ਲਿਆ...ਇੰਨਾਂ ਪਾਖੰਡਾਂ 'ਚ ਕੀ ਪਿਐ..”ਕੁੜੀ ਨੇ ਦਲੀਲ ਨਾਲ ਗੱਲ ਕਰਦਿਆਂ ਕਿਹਾ। “ਪੁੱਤ ਇਹ ਗੱਲ ਤਾਂ ਮੈਂ ਵੀ ਸੁਣੀ ਐ ..ਮਖ਼ਿਆਂ ਲੋਕਾਂ ਨੇ ਊਈਂ ਉਡਾ ਤੀਂ ਹੋਊ..ਪਰ ਕੀ ਕਰਾਂ ਘਰ ਦੇ ਰੀਤੀ-ਰਿਵਾਜ਼ਾ ਨੂੰ ਵੀ ਛੱਡਣਾ ਔਖੈ..।.”ਉਸਨੇ ਕੁੜੀ ਦੀ ਗੱਲ ਨਾਲ ਸਹਿਮਤੀ ਜਿਹੀ ਪ੍ਰਗਟ ਕਰਦਿਆਂ ਕਿਹਾ। “ ਮਾਂ,ਆਹ ! ਪਾਖੰਡ ਛੱਡ ਦੇ ਹੁਣ..” ਮੀਤੋ ਨੇ ਆਪਣੀਆਂ ਨਜ਼ਰਾਂ ਮਾਂ ਦੇ ਚਿਹਰੇ ਤੇ ਟਿਕਾਉਦਿਆਂ ਕਿਹਾ। “ ਚੱਲ ਧੀਏ ! ਹੋ ਜਾ ਤਿਆਰ ..ਸ਼ਹਿਰ ਵੱਡੇ ਡਾਕਦਾਰ ਕੋਲ ਚੱਲੀਏ.. ਆਪਾਂ ਨੂੰੰ ਕਿਹੜਾ ਪਹਿਲਾਂ ਇੰਨ•ਾਂ ਨੇ ਤਾਰ ਤਾਂ ..।” ਬਚਨੀ ਨੇ ਆਪਣੀ ਗੱਲ ਨੂੰ ਬਦਲਦਿਆਂ ਕਿਹਾ।

Tuesday, October 30, 2012

ਫੇਸਬੁੱਕ

ਮੇਰੀ ਫੇਸਬੁੱਕ ਦੀ ਫਰੈਂਡਲਿਸਟ ਵਿੱਚ ਹੋਰਨਾਂ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਮੇਰੀਆਂ ਵਿਦਿਆਰਥਣਾਂ ਵੀ ਸ਼ਾਮਿਲ ਹਨ। ਆਨ ਲਾਈਨ ਕਦੇ ਕਦਾਈਂ ਇਹ ਮੇਰੇ ਤੋਂ ਮਾਰਗ ਦਰਸ਼ਨ ਵੀ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਦੀਆਂ ਰਹਿੰਦੀਆਂ ਹਨ। ਅਜੇ ਮੈਂ ਫੇਸਬੁੱਕ ਆਨ ਹੀ ਕੀਤੀ ਹੈ ਕਿ ਧੜਾਧੜ ਅਪਡੇਟਸ ਆਉਣੇ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋ ਗਏ ਹਨ। ਮੇਰੀ ਵਿਦਿਆਰਥਣ ਰਿੰਪੀ ਨੇ ਅੱਜ ਫੇਰ ਆਪਣੀ ਪ੍ਰੋਫਾਈਲ ਪਿਕਚਰ ਚੇਂਜ ਕਰ ਦਿੱਤੀ ਹੈ। ਕੁਦਰਤੀ ਇਹ ਆਨਲਾਈਨ ਵੀ ਹੈ। ਮੈਸੇਜ ਆਉਂਦਾ ਹੈ… "ਸਰ , ਸਤਿ ਸ਼੍ਰੀ ਅਕਾਲ ।" "ਸਤਿ ਸ਼੍ਰੀ ਅਕਾਲ….. ਕੀ ਗੱਲ ਅੱਜ ਫੇਰ ਫੋਟੋ ਚੇਂਜ ਕਰ ਦਿੱਤੀ… ਕੀਹਦੀ ਹੈ ਏਹ?"- ਮੈਂ ਪੁੱਛਿਆ ਹੈ । " ਸਰ…. ਹੀਰੋਈਨ ਹੈ…. ਕੈਟਰੀਨਾ ਕੈਫ਼ !" ਜਵਾਬ ਪੜ੍ਹਦੇ ਹੀ ਦਿਮਾਗ ਘੁੰਮਣ ਲਗ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਕਿ ਅੱਜ ਕੱਲ ਦੇ ਬੱਚਿਆਂ ਨੂੰ ਹੋ ਕੀ ਗਿਆ ਹੈ। ਮੈਂ ਦੁਬਾਰਾ ਪੁੱਛਦਾ ਹਾਂ …."ਬੇਟਾ … ਇਸ ਦੀ ਫੋਟੋ ਕਿਉਂ ਲਗਾਈ ਐ….।" "ਸਰ.. ਕੋਈ ਸਾਡੀ ਫੋਟੋ ਦਾ ਮਿਸ ਯੂਜ਼ ਨਾ ਕਰ ਲਵੇ, ਇਸੇ ਕਰਕੇ ਲਗਾਈ ਐ…।"- ਉਸਨੇ ਲਿਖਿਆ ਹੈ। " ਓਹ ਤਾਂ ਠੀਕ ਹੈ ਬੇਟੇ… ਪਰ ਤੁਸੀਂ ਐਕਟਰਸ ਦੀਆਂ ਹੀ ਫੋਟੋਆ ਕਿਉਂ ਲਗਾਉਂਦੇ ਹੋ… ਮਦਰ ਟਰੇਸਾ ਜਾਂ ਕਿਰਨ ਬੇਦੀ ਦੀ ਕਿਉਂ ਨਹੀਂ…?" ਮੇਰੇ ਇੰਨਾਂ ਲਿਖਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਰਿੰਪੀ ਆਫ਼ ਲਾਈਨ ਹੋ ਗਈ। -0-

Wednesday, September 19, 2012

कीमत

मैंने कहा जी ! आप कब के शराब पीने लगे हो । आपको पता है कि टाईम क्या हुआ है.... रात के बारां बजने को हैं । अपना शाम आज पहली दफा फैक्टरी गया है और अभी तक घर नहीं लौटा है । मेरा मन बहुत घबरा रहा है' भागवती अपने पति सेठ राम लाल से बोली । 'वह कौन सा दूघ पीता बच्चा है । आ जाऐगों फालतू में क्यों टेंशन ले रही हो । थोड़ा इंतजार करो। नहीं तो कोई फोन वगैरह करके पता करता हूँ ।' कुछ ही समय पश्चात दरवाजे की घंटी बजने से भागवती के सांस में सांस आता है । “क्यों बेटा इतना लेटें आज कल का समय बहुत खराब है” मेरी तो जान मुट्‌ठी में आई पडी थी ।' भगवती एकदम बोली । ‘अरे! कोई फोन ही कर देता तेरी मां बडी चिंता कर रही थी, चल बता कि तुझे अपनी फैक्टरी कैसी लगी ?' रामलाल ने अपने बेटे से पूछा । 'फैक्टरी तो ठीक है पापा जी ! पर मेरी समझ में ये बात नहीं आ रही कि आप ने वहां पर सिर्फ बाहर के ही मजदूर क्यों रखे हुए हैं, जब कि अपने पंजाबी लोग तो यहाँ पर खाली घूमते फिर रहे हैं ।' 'बेटा ! तुम्हारी समझ में नाहीं आवे ये बातें’ ‘कैसे पापा जी ? 'तुझे तो पता ही है कि हमारी फैक्टरी में कैसा काम है, मामूली सी लापरवाही से ही मजदूर की मौत हो जाती है, यदि इन में से कोई मजदूर मर खप जाए तो यह दस बीस हजार रुपए लेकर समझौता कर लेते हैं और अपने वाले तो लाखों की बात करते है।' सेठ राम लाल ने खसियानी हँसी हँसते हुए शराब का एक और पैग अपने अंदर डाल लिया ।

सम्मान

गाँव के एक क्लब की ओर से सेमीनार करवाने का फैसला लिया गया । क्लब के अध्यक्ष और कुछ स्दस्य सेमीनार के बारे में राजनेताओं, समाजसेवियों और पत्रकारों को बताने के लिए शहर गए । एक पत्रकार से क्लब के अध्यक्ष ने निवेदन किया, 'हम क्लब की ओर से सेमीनार करवा रहे हैं, कवरेज के लिए आपको पधारना है ।' 'किस दिन' ? ना जी, उस दिन तो समय बिलकुल नहीं । मंत्री जी का दौरा है और.....।' 'हमें पता है जी, वह तो सुबह आ रहे हैं । हमने प्रोग्राम शाम का रखा है ।' अध्यक्ष जी बोले । 'ओह तो भी, मंत्री जी की कवरेज के बाद ओर बहुत कुछ चलता रहता है, इसलिए समय नहीं निकल पाएगा ।' 'हमने भी प्रोग्राम के बाद बहुत कुछ रखा है, जनाब ।' 'अध्यक्ष जी आप साफ साफ क्यों नहीं बताते, छुपाए क्यों जाते हो ?' क्लब के सदस्य ने कहा । 'दरअसल उस दिन आप का सम्मान भी करना है ।' 'अच्छाअच्छों चलो निकाल लेंगे समय ।' पत्रकार की आवाज थोड़ी बदली हुई थी । 'यह तो आप को पता ही होगा कि सम्मान में ग्यावह सौ रुपए, शाल और मोमैंटो आदि भी होगा ।' क्लब के अन्य सदस्य ने बीच में ही कहा । 'ओह जी कोई ना, मै......आप चिंता न करो, मेरे और साथी पत्रकार भी आएंगे । मैं कह दूंगा, पूरी कवरेज होगी ।'

Friday, May 25, 2012

अपना घर

बहू की कही गई बातों के कारण वह सारी रात सो नहीं सका। सुबह सैर पर उसके मित्र ने पूछ ही लिया, “क्या बात है वेद प्रकाश, आज तुम्हारा मूड ठीक नहीं लग रहा। जरूर घर पर किसी ने कुछ कहा होगा।” “क्या बताऊँ भई! जब अपने जन्मे ही बेगाने हो जाएँ तो दूसरा कौन परांठे देगा। तुझे पता ही है कि रिटायरमेंट के कुछ समय बाद ही तुम्हारी भाभी तो भगवान को प्यारी हो गई थी…बस उसके बाद तो मेरा जीवन नर्क ही बन गया…।” “न… बात क्या हो गई?” मित्र ने पूरी बात जानने की उत्सुकता से पूछा। “बात क्या होनी थी… बस शाम को दोनों मियाँ-बीबी सिनेमा जाना चाहते थे…इसलिए जल्दी ही रोटियाँ बना कर रख दीं…बहू ने मुझे कहा– ‘पापा जी, रोटी खा लो’…।” “फिर?” “मैने कहा–‘बेटा, मुझे अभी भूख नहीं, बाद में आने पर दे देना।’…बस मेरे इतना कहने की देर थी कि बहू का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया–‘न, हमें और कोई काम नहीं…रात को आकर रोटी दें…हमने सोना भी है…हमारी भी कोई लाइफ है…न आप ठीक से जीते हैं, न दूसरों को जीने देते हैं।’…और भी बहुत कुछ कहा…” बोलते-बोलते उसका गला रुंध गया। “देख भाई वेद प्रकाश! करना तो तुम अपनी मर्जी…मेरी तो यही राय है…तुम्हारे पास पैसे-टके की तो कोई कमी नहीं, पर औरत के बिना इस उम्र में आदमी की ज़िंदगी नरक बन जाती है। मैं तो कहता हूँ कि किसी ज़रूरतमंद पर चादर डाल ले…।” “तुम्हारा दिमाग तो खराब नहीं हो गया?… मैं इस उम्र में ऐसा काम करूँगा तो दुनिया क्या कहेगी?” “दुनिया की ज्यादा परवाह नहीं करते…सबको अपनी ज़िंदगी जीने का अधिकार है…और किसी वृद्ध-आश्रम में जाकर मरने से तो अपने घर में सुखी जीवन व्यतीत करना कहीं अच्छा है।” वेद प्रकाश अपने मित्र की बातों से सहमति-सी प्रकट करता अपने नए घर की तलाश में जुट गया।

साँप

कई दिनों से बरसात रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। लोग पशुओं के चारे के लिए भी परेशान थे। साहसी लोग सिर पर खाली बोरियाँ ओढ़ खेतों में से चारा लेने जा रहे थे। अपने इकलौते बेटे जीत को खेत की ओर जाते देख, प्रीतम कौर के मुख से निकल गया, “पुत्तर! जरा देख कर जाना… इस मौसम में ससुरे साँप-संपोलिए सब बाहर निकल आते हैं…” इस एक वाक्य ने उसके जीवन के पिछले जख़्मों को हरा कर दिया। उसे याद आया कि पति की रस्म-पगड़ी के बाद रिश्तेदारों ने ज़ोर देकर उसके जेठ के बड़े बेटे को उनके पास सहारे के रूप में छोड़ दिया था। एक रात अचानक उसकी नींद खुल गई। उसने देखा कि वह लड़का उसकी सो रही जवान बेटियों के सिरहाने खड़ा कुछ गलत करने की चेष्टा कर रहा था। “जा निकल जा मेरे घर से…ज़रूरत नहीं है मुझे तेरे सहारे की…मैं तो अकेली ही भली…भगवान सहारे अपनी मेहनत मज़दूरी से बच्चों को पाल लूँगी…जा तू दफा हो जा…” अगली सुबह रोते हुए उसने जेठ के लड़के को घर से बाहर कर दिया था। ‘जानवर तो छेड़ने पर ही कुछ कहते हैं, उसका तो पता होता है कि भई नुकसान पहुँचा सकता है, पर आस्तीन के साँप का क्या पता कि किस वक्त डस ले…” अतीत की बातों को याद करते हुए प्रीतम कौर का मन भर आया।